
अभय सरन हरि के चरन की जिन लई सम्हाल ।
तिनतें हारथी सहज ही अति कराल हू काल ॥
राजपूताने के किसी गाँव में कूबा नामके कुम्हार जाति के एक भगवद्भक्त रहते थे । ये अपनी पत्नी पुरी के साथ महीने भरमें मिट्टी के तीस बर्तन बना लेते और उन्ही को बेचकर पति – पत्नी जीवन – निर्वाह करते थे । धन का लोभ था नहीं भगवान के भजन में अधिक से अधिक समय लगना चाहिये, इस विचार से कूबाजी अधिक बर्तन नहीं बनाते थे। घर पर आये हुए अतिथियों की सेवा और भगवान का भजन बस इन्हीं दो कामों में उनकी रुचि थी ।
धनका सदुपयोग तो कोई बिरले पुण्यात्मा ही कर पाते हैं । धनकी तीन गतियाँ हैं — दान,भोग और नाश । जो न दान करता और न सुख – भोग में धन लगाता उसका धन नष्ट हो जाता है । चोर – लुटेरे न ले जायँ, मुकदमे या रोगियों की चिकित्सामें भी नष्ट होतो भी कंजूस का धन उसकी सन्तान को बुरे मार्ग में ले जाता है और वे उसे नष्ट कर डालते हैं । भोग में धन लुटाने से पाप का सञ्चय होता है । अतः धन का एक ही सदुपयोग है — दान । घर आये अतिथि का सत्कार । एक बार कूबाजी के ग्राम में दो सौ साधु पधारे । साधु भूखे थे । गाँव में सेठ – साहूकार थे, किंतु किसी ने साधुओंका सत्कार नहीं किया । सबने कूबाजी का नाम बता दिया । साधु कूबाजी के घर पहुँचे ।
घर पर साधुओं की इतनी बड़ी मण्डली देखकर कूबाजी को बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने नम्रता पूर्वक सबको दण्डवत् प्रणाम किया । बैठने को आसन दिया । परंतु इतने साधुओं को भोजन कैसे दिया जाय, घर में तो एक छटाँक अन्न नहीं था । एक महाजन के पास कूबाजी ऊधार माँगने गये । महाजन इनकी निर्धनता जानता था और यह भी जानता था कि ये टेकके सच्चे हैं । उसने यह कहा — मुझे एक कुआ खुदवाना है । तुम यदि दूसरे मजदूरोंकी सहायता के बिना ही कुआँ खोद देने का वचन दो तो मैं पूरी सामग्री देता हूँ । कूबाजी ने शर्त स्वीकार कर ली । महाजन से आटा, दाल, घी आदि ले आये । साधु मण्डली ने भोजन किया और कूबाजी को आशीर्वाद देकर विदा हो गये । साधुओं के जाते ही कूबाजी अपने वचन के अनुसार महाजन के बताये स्थान पर कुआँ खोदने में लग गये । वे कुआँ खोदते और उनकी पतिव्रता स्त्री पूरी मिट्टी फेंकती । दोनों ही बराबर हरिनाम – कीर्तन किया करते । बहुत दिनों तक इसी प्रकार लगे रहने से कुएँ में जल निकल आया । परंतु नीचे बालू थी । ऊपर की मिट्टी को सहारा नहीं था । कुआँ बैठ गया । पुरी मिट्टी फेंकने दूर चली गयी थी । कूबाजी नीचे कुएँ में थे । वे भीतर ही रह गये । बेचारी पुरी हाहाकार करने लगी ।
गाँव के लोग समाचार पाकर एकत्र हो गये । सबने यह सोचा कि मिट्टी एक दिन में तो निकल नहीं सकती । कूबाजी यदि दबकर न भी मरे होंगे तो श्वास रुकने से मर जायँगे। पुरीको वे समझा – बुझाकर घर लौटा लाये । कुछ लोगों ने दयावश उसके खाने – पीने का सामान भी पहुँचा दिया । बेचारी स्त्री कोई उपाय न देखकर लाचार घर चली आयी । गाँव के लोग इस दुर्घटना को कुछ दिनों में भूल गये । वर्षा होने पर कुएँ के स्थान पर जो थोड़ा गड्टा था वह भी मिट्टी भरने से बराबर हो गया ।
एक बार कुछ यात्री उधर से जा रहे थे । रात्रि में उन्होंने उस कुएँ वाले स्थान पर ही डेरा डाला । उन्हें भूमि के भीतर से करताल, मृदङ्ग आदि के साथ कीर्तन की ध्वनि सुनाई पड़ी । उनको बड़ा आश्चर्य हुआ । रातभर वे उस ध्वनि को सुनते रहे । सबेरा होने पर उन्होंने गाँव वालों को रात की घटना बतायी । अब जो जाता जमीन में कान लगाने पर उसीको वह शब्द सुनायी पड़ता । वहाँ दूर – दूरसे लोग आने लगे । समाचार पाकर स्वयं राजा अपने मन्त्रियों के साथ आये । भजन की ध्वनि सुनकर और गाँव वालों से पूरा इतिहास जानकर उन्होंने धीरे – धीरे मिट्टी हटवाना प्रारम्भ किया । बहुत – से लोग लग गये कुछ घंटों में कुआँ साफ हो गया । लोगों ने देखा कि नीचे निर्मल जलकी धारा बह रही है । एक ओर आसन पर शङ्ख – चक्र – दा – पद्मधारी भगवान् विराजमान है और उनके सम्मुख हाथ में करताल लिये कूबाजी कीर्तन करते, नेत्रों से अश्रुधारा बहाते तन – मन की सुधि भूले नाच रहे हैं। राजाने यह दिव्य दृश्य देखकर अपना जीवन कृतार्थ माना ।
अचानक वह भगवान की मूर्ति अदृश्य हो गयी । राजा ने कूबाजी को कुएँ से बाहर निकलवाया । सबने उन महाभागवत की चरण – धूलि मस्तकपर चढ़ायी । कूबाजी घर आये । पत्नी ने अपने भगवद्भक्त पतिको पाकर परमानन्द लाभ किया । दूर – दूर से अब लोग कूबाजी के दर्शन करने और उनके उपदेश में लाभ उठाने आने लगे । राजा नियमपूर्वक प्रतिदिन उनके दर्शनार्थ आते थे । एक बार अकालके समय कूबाजी की कृपा से लोगों को बहुत – सा अन्न प्राप्त हुआ था । उनके सत्सङ्ग से अनेक स्त्री – पुरुष भगवान के भजन में लगकर संसार – सागर से पार हो गये ।
“जय हो कुबा कुम्हार की”
